बिहार की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार का एक वीडियो संदेश अचानक बड़ा विवाद बन गया है। इस वीडियो में वह भाजपा प्रत्याशी नीरज सिन्हा के समर्थन में वोट देने की अपील करते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो सामने आते ही जन सुराज के नेता प्रशांत किशोर ने इसे AI से तैयार किया गया और फर्जी बताया, जिसके बाद मामला चुनावी बहस से निकलकर तकनीकी जांच और राजनीतिक विश्वसनीयता तक पहुंच गया।
यह वीडियो सबसे पहले भाजपा के आधिकारिक X हैंडल से साझा किया गया था। इसमें नीतीश कुमार बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं से भाजपा प्रत्याशी को समर्थन देने की बात कहते नजर आते हैं। कुछ घंटों बाद जेडीयू ने भी वही वीडियो अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से पोस्ट किया। दोनों दलों द्वारा एक ही वीडियो साझा किए जाने के कारण इसकी प्रामाणिकता को लेकर चर्चा और तेज हो गई।
प्रशांत किशोर ने प्रेस से बातचीत में दावा किया कि यह वीडियो AI तकनीक से बनाया गया है और नीतीश कुमार ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया। उन्होंने भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कहा कि यदि नीतीश कुमार सार्वजनिक रूप से यही बात दोबारा कह दें तो उनकी पार्टी चुनावी दावेदारी पर पुनर्विचार करेगी। उनके इस बयान ने चुनावी माहौल को और अधिक गर्म कर दिया।
प्रशांत किशोर के आरोपों के बाद जेडीयू की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार ने पटना के शास्त्री नगर थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि वीडियो पूरी तरह सही है और इसके बारे में झूठ फैलाकर मतदाताओं को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इसे चुनावी माहौल को प्रभावित करने वाला बयान बताया।
वीडियो की तकनीकी जांच को लेकर भी चर्चा हुई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एक विश्वसनीय AI और डीपफेक डिटेक्शन टूल से इसकी जांच कराई गई। रिपोर्ट में वीडियो के AI से तैयार होने की संभावना बेहद कम बताई गई। आवाज, चेहरे की गतिविधियों और वीडियो संरचना में भी कृत्रिम हस्तक्षेप के स्पष्ट संकेत नहीं पाए गए। इस आधार पर वीडियो को प्रामाणिक माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर का यह दावा केवल तकनीकी सवाल नहीं बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। उनका पूरा अभियान बदलाव और सत्ता-विरोधी भावना को मजबूत करने पर केंद्रित रहा है। ऐसे में यदि नीतीश कुमार खुलकर भाजपा उम्मीदवार के समर्थन में दिखाई देते हैं तो विशेष रूप से महिला और अति पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं पर उसका असर पड़ सकता है, जिन्हें लंबे समय से नीतीश कुमार का प्रभावशाली समर्थन आधार माना जाता है।
विश्लेषकों के अनुसार भाजपा और जेडीयू ने भी इस संदेश के जरिए गठबंधन की एकजुटता दिखाने की कोशिश की है। चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में नीतीश कुमार का वीडियो जारी करना, उनके परिवार और पार्टी नेताओं की सक्रियता बढ़ाना और संयुक्त राजनीतिक संदेश देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इससे यह संकेत देने की कोशिश हुई कि एनडीए में किसी प्रकार की दूरी नहीं है।
इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत विश्वसनीयता भी है। उन्हें लंबे समय तक डेटा और तथ्यों पर आधारित राजनीति करने वाले रणनीतिकार के रूप में देखा गया है। यदि उनका AI वाला दावा व्यापक रूप से गलत साबित होता है तो तटस्थ और शिक्षित मतदाताओं के बीच उनकी विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है। वहीं उनके समर्थक इसे सत्ता पक्ष पर दबाव बनाने की राजनीतिक कोशिश मान रहे हैं।
नीतीश कुमार के प्रचार में सीमित भागीदारी को लेकर भी चर्चाएं जारी हैं। जानकारी के अनुसार स्वास्थ्य संबंधी कारणों से वह लंबे भाषणों और लगातार सार्वजनिक सभाओं से बच रहे हैं। हालांकि वह कुछ कार्यक्रमों में शामिल हुए हैं, लेकिन भाजपा प्रत्याशी के लिए मैदान में जाकर प्रचार नहीं किया। इसी कारण वीडियो संदेश को उनके प्रत्यक्ष प्रचार का विकल्प माना जा रहा है।
कुल मिलाकर यह विवाद केवल एक वायरल वीडियो का नहीं है, बल्कि बिहार की चुनावी राजनीति, गठबंधन की मजबूती, मतदाताओं की धारणा, AI तकनीक के बढ़ते प्रभाव और नेताओं की विश्वसनीयता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। वीडियो फिलहाल तकनीकी जांच में सही माना जा रहा है, लेकिन प्रशांत किशोर के आरोपों ने यह बहस जरूर छेड़ दी है कि आने वाले चुनावों में डिजिटल सामग्री और AI को लेकर राजनीतिक दावे कितने संवेदनशील और प्रभावशाली साबित हो सकते हैं।

