सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: टिकट न मिलने पर भी नहीं रुकेगा रेलवे मुआवजा, ‘सेकेंड क्लास यात्री’ शब्द पर जताई आपत्ति

You are currently viewing सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: टिकट न मिलने पर भी नहीं रुकेगा रेलवे मुआवजा, ‘सेकेंड क्लास यात्री’ शब्द पर जताई आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे दुर्घटना मुआवजा मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को केवल टिकट बरामद न होने के आधार पर वैध यात्री (बोना फाइड पैसेंजर) मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि रेलवे दुर्घटना मुआवजा कानून एक कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसकी व्याख्या उदार और न्यायसंगत तरीके से की जानी चाहिए ताकि पीड़ित परिवारों को राहत मिल सके।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे नियमों में इस्तेमाल होने वाले ‘सेकेंड क्लास पैसेंजर’ शब्द पर भी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि ‘सेकेंड क्लास’ शब्द का संबंध केवल रेलवे कोच या यात्रा श्रेणी से होना चाहिए, किसी व्यक्ति या यात्री की पहचान से नहीं। किसी यात्री का सम्मान उसके द्वारा खरीदे गए टिकट या यात्रा श्रेणी के आधार पर कम या ज्यादा नहीं आंका जा सकता।

यह फैसला मध्य प्रदेश के एक दशक पुराने रेल हादसे से जुड़े मामले में आया। वर्ष 2015 में चंद्रकांत ठक्कर रायपुर से अहमदाबाद की यात्रा के दौरान ट्रेन से गिर गए थे, जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी। हादसे के बाद उनका सामान भी नहीं मिल पाया और परिजनों के अनुसार टिकट उसी बैग में रखा हुआ था। टिकट बरामद न होने के कारण रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उनके परिवार को मुआवजा देने से इनकार कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दोनों निचली अदालतों के फैसलों को रद्द करते हुए मृतक की पत्नी लता ठक्कर के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने केंद्र सरकार और रेलवे को चार सप्ताह के भीतर 8 लाख रुपये का मुआवजा जारी करने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि यदि तय समय के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है तो दावा दायर किए जाने की तारीख से 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि कोई दावेदार शपथपत्र, परिस्थितिजन्य साक्ष्य या अन्य उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह साबित कर देता है कि संबंधित व्यक्ति वैध रूप से यात्रा कर रहा था, तो केवल टिकट का न मिलना उसके अधिकार को समाप्त नहीं करता। ऐसी स्थिति में दावे को गलत साबित करने की जिम्मेदारी रेलवे प्रशासन की होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यात्रियों की सुरक्षा को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि रेल यात्रियों को यात्रा के दौरान सावधानी बरतनी चाहिए और चलती ट्रेन में चढ़ने, दरवाजे पर खड़े होकर सफर करने या अन्य जोखिम भरे व्यवहार से बचना चाहिए। वहीं रेलवे प्रशासन को भी भीड़भाड़ वाले मार्गों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने, भीड़ नियंत्रण के प्रभावी उपाय लागू करने और दुर्घटनाओं को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।

इस फैसले को रेलवे दुर्घटना पीड़ितों के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि मुआवजा देने का उद्देश्य तकनीकी कारणों से दावे खारिज करना नहीं, बल्कि वास्तविक पीड़ितों को न्याय और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है। टिकट का अभाव अपने आप में यह साबित नहीं करता कि मृतक या घायल व्यक्ति अवैध रूप से यात्रा कर रहा था। इसलिए भविष्य में ऐसे मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लिया जाना चाहिए।