भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में शनिवार को आयोजित ‘सफलता के मंत्र’ सम्मान समारोह सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि यह उन सपनों का मंच बन गया, जो सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत और संकल्प से साकार हुए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी में यूपीएससी में चयनित 61 अभ्यर्थियों को सम्मानित किया गया। मंच पर बैठे इन चेहरों की चमक उनके संघर्ष की कहानी खुद बयां कर रही थी—कोई छोटे शहर से था, कोई किसान परिवार से, तो किसी ने सरकारी कॉलेज से पढ़ाई कर देश की सबसे कठिन परीक्षा में सफलता हासिल की।
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में लोकतंत्र की ताकत को बेहद सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा कि यही इस व्यवस्था की खूबसूरती है कि यहां एक सामान्य पृष्ठभूमि का व्यक्ति भी देश के सर्वोच्च पदों तक पहुंच सकता है। अपने अंदाज में उन्होंने यह भी कहा कि जहां अफसरों की एक बार परीक्षा होती है, वहीं जनप्रतिनिधियों को हर पांच साल में जनता के बीच अपनी परीक्षा देनी पड़ती है। उनके इस बयान पर सभागार में मौजूद लोग मुस्कुराते नजर आए, लेकिन इसके पीछे जिम्मेदारी का एक गंभीर संदेश भी था।
कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने ‘प्रतिभाओं का परचम’ नामक पुस्तिका का विमोचन किया और सभी चयनित अभ्यर्थियों को सम्मानित किया। उन्होंने युवाओं से कहा कि वे खुद को सौभाग्यशाली समझें, क्योंकि वे उस दौर में देश की सेवा करने जा रहे हैं जब भारत 2047 के अमृतकाल की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने अपने जीवन का उदाहरण देते हुए यह भी बताया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और उन्होंने खुद भी व्यस्त राजनीतिक जीवन के बीच कई शैक्षणिक डिग्रियां हासिल कीं।
मुख्यमंत्री ने नवचयनित अधिकारियों के सामने पांच मूल मंत्र भी रखे—समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का भाव, काम में नवाचार, समय और कार्य की पवित्रता, ईमानदारी और विकसित भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका। उन्होंने साफ कहा कि पद मिलना अंत नहीं, बल्कि असली जिम्मेदारी की शुरुआत है, और फील्ड में काम ही किसी अधिकारी की असली पहचान बनाता है।
इस मौके पर अपर मुख्य सचिव अनुपम राजन ने भी कार्यक्रम की पृष्ठभूमि साझा की। उन्होंने बताया कि यह पहल 2020 में शुरू हुई थी, जब चयनित अभ्यर्थियों की संख्या 37 थी, जो अब बढ़कर 61 हो चुकी है। इनमें 20 बेटियां शामिल हैं, जो महिला सशक्तिकरण की मजबूत तस्वीर पेश करती हैं। खास बात यह रही कि 22 अभ्यर्थी ऐसे हैं, जिन्होंने सरकारी कॉलेजों से पढ़ाई करते हुए यह मुकाम हासिल किया, जिससे यह धारणा भी टूटी कि सफलता के लिए बड़े शहर या महंगे संस्थान जरूरी होते हैं।
समारोह में यह संदेश भी प्रमुखता से उभरा कि अब यूपीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली जाना या अंग्रेजी माध्यम ही जरूरी नहीं रहा। छोटे जिलों और साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं ने यह साबित कर दिया है कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो, तो संसाधनों की कमी रास्ता नहीं रोक सकती।
कुल मिलाकर, यह कार्यक्रम न सिर्फ चयनित अभ्यर्थियों के सम्मान का मंच था, बल्कि हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बन गया, जो सीमित साधनों के बावजूद बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला रखते हैं।