सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग माता-पिता की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जरूरत पड़ने पर वरिष्ठ नागरिक अपने बच्चों को संपत्ति से बेदखल करा सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब किसी व्यक्ति के लिए असुरक्षा, उपेक्षा या अपमान नहीं होना चाहिए। बुजुर्गों को भी सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने का पूरा अधिकार है।
फैसले में कहा गया कि यदि बच्चों की वजह से माता-पिता की सुरक्षा और गरिमा प्रभावित हो रही है, तो उनकी रक्षा के लिए संपत्ति से बेदखली का कदम उठाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और सुरक्षा से जुड़े कानून का उद्देश्य केवल भरण-पोषण तक सीमित नहीं है। जरूरत पड़ने पर बुजुर्गों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मामला एक ऐसे मकान से जुड़ा था, जिसे माता-पिता ने अपनी कमाई से खरीदा था। विवाद उस समय बढ़ गया, जब परिवार के बुजुर्ग सदस्य को घर में परेशानी के कारण वहां से अलग होकर रहने की स्थिति का सामना करना पड़ा।
इस मामले में संबंधित अधिकारियों ने बेटे और बहू को मकान खाली करने का आदेश दिया था। बाद में इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और वहां बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया गया था।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि बुजुर्गों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए ट्रिब्यूनल जरूरी कदम उठा सकता है।
कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े कानून की धाराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ट्रिब्यूनल को कानून के उद्देश्य को पूरा करने के लिए आवश्यक अधिकार दिए गए हैं। इनमें परिस्थितियों के अनुसार संपत्ति से बच्चों को हटाने का आदेश देना भी शामिल हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का भी हवाला दिया और कहा कि यदि माता-पिता या वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए बेदखली जरूरी हो, तो ट्रिब्यूनल ऐसा आदेश दे सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कितना सम्मानजनक व्यवहार करता है। वरिष्ठ नागरिकों की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान की रक्षा करना समाज और कानून दोनों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

