कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने RSS की विचारधारा को लेकर कहा कि संगठन का मूल उद्देश्य भारत को हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व की विचारधारा के रूप में आगे बढ़ाना है और इस बुनियादी सोच में अब तक कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। हालांकि, उन्होंने RSS प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयानों को सकारात्मक संकेत बताया और कहा कि पिछले कुछ वर्षों में उनके सार्वजनिक वक्तव्यों में कुछ बदलाव दिखाई दे रहे हैं। थरूर ने यह बात मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कही, जहां युवाओं और देश के मौजूदा सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा हुई।
थरूर के मुताबिक, किसी भी राजनीतिक या सामाजिक विचारधारा से असहमति होने का मतलब यह नहीं है कि उससे जुड़े लोगों के साथ संवाद नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों के साथ बातचीत लोकतांत्रिक व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है। उनके अनुसार, केवल इस वजह से किसी व्यक्ति की आलोचना करना उचित नहीं है कि उसने ऐसे मंच पर हिस्सा लिया, जहां उससे अलग विचारधारा रखने वाला कोई व्यक्ति भी मौजूद था। उन्होंने संवाद को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
उन्होंने कहा कि वह लंबे समय से RSS प्रमुख के बयानों पर नजर रखते रहे हैं और उन्हें अब पहले की तुलना में कुछ बदलाव दिखाई दे रहा है। थरूर ने मोहन भागवत की ओर से युवाओं को लेकर दिए गए हालिया बयानों को इसी बदलाव के संकेत के तौर पर देखा। उनका कहना था कि युवा पीढ़ी को केवल आलोचना की नजर से देखने के बजाय उसकी बात सुनना और उसकी चिंताओं को समझना जरूरी है। उन्होंने युवाओं के साथ सीधे संवाद की जरूरत पर भी जोर दिया।
मोहन भागवत ने युवाओं के साथ बातचीत के दौरान Gen-Z और Gen-अल्फा को लेकर कहा था कि आज की युवा पीढ़ी देशभक्ति और ईमानदारी के मामले में पिछली पीढ़ियों से कम नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि युवाओं की बात को समझना जरूरी है और यदि उनसे संवाद नहीं किया जाएगा तो उनके बीच असंतोष पैदा हो सकता है। थरूर ने भागवत के इस रुख को सकारात्मक माना और कहा कि युवाओं के सवालों को सुनना तथा उनके साथ बातचीत करना वर्तमान समय की बड़ी आवश्यकता है।
थरूर ने वर्ष 2029 के चुनावों को लेकर भी युवाओं की भूमिका पर बात की। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में Gen-Z मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग बनने जा रहा है और राजनीतिक दलों को उनकी बदलती सोच और अपेक्षाओं को गंभीरता से समझना होगा। उन्होंने कहा कि युवा अब पुराने तरीके से राजनीति चलाए जाने को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। उनके मुताबिक, दक्षिण एशिया की राजनीतिक पार्टियों को यह समझना होगा कि राजनीति के पुराने तौर-तरीकों से भविष्य की चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस को लेकर थरूर ने कहा कि वह ऐसी पार्टी का हिस्सा हैं जो उनकी विचारधारा और सोच के सबसे करीब है। उन्होंने कांग्रेस को देश की कम अलोकतांत्रिक पार्टियों में से एक बताते हुए कहा कि पार्टी के भीतर असहमति रखने की गुंजाइश मौजूद है। उन्होंने अपनी बात रखते हुए राजनीतिक दलों में आंतरिक संवाद और असहमति के महत्व पर जोर दिया। उनका कहना था कि किसी पार्टी के भीतर अलग राय रखने वाले नेताओं की बात सुनी जानी चाहिए और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचारों की विविधता को जगह मिलनी चाहिए।
थरूर ने छात्र आंदोलनों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जिन मुद्दों को बाद में बड़े छात्र आंदोलनों के जरिए उठाया गया, उनमें से कई चिंताओं को कांग्रेस नेता राहुल गांधी पहले ही अपने अभियानों के माध्यम से सामने ला चुके थे। इसके बावजूद कांग्रेस को उन मुद्दों पर वैसा व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला, जैसा बाद में छात्र आंदोलन के दौरान देखने को मिला। थरूर ने इसे कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का विषय बताया।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस को यह समझने की जरूरत है कि उसके द्वारा उठाए गए मुद्दों को जनता के बीच वैसी प्रतिक्रिया क्यों नहीं मिल पाई। उनके मुताबिक, केवल मुद्दों को उठाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी समझना जरूरी है कि आम लोगों की प्राथमिकताएं क्या हैं और वे किन समस्याओं को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को जनता की नब्ज को बेहतर तरीके से समझना होगा और युवाओं के साथ सीधा संपर्क मजबूत करना होगा।
राहुल गांधी ने छात्र और युवा वर्ग से जुड़े मुद्दों को लेकर एक अभियान की शुरुआत भी की थी, जिसे बाद में कई अन्य शहरों तक ले जाने की कोशिश की गई। थरूर ने इस संदर्भ में कहा कि कांग्रेस ने कई चिंताओं को पहले ही उठाया था, लेकिन पार्टी अपने प्रयासों को उस स्तर का जनसमर्थन दिलाने में सफल नहीं रही। उन्होंने कहा कि इस अनुभव से पार्टी को सीख लेने की जरूरत है और यह देखना होगा कि जनता के बीच अपनी बात पहुंचाने के तरीके में किस तरह सुधार किया जा सकता है।
पूरे मामले में थरूर की बातों का मुख्य जोर संवाद, युवाओं की बदलती सोच और राजनीतिक दलों के काम करने के तरीके पर रहा। एक ओर उन्होंने RSS की मूल विचारधारा में बदलाव नहीं होने की बात कही, वहीं दूसरी ओर मोहन भागवत के युवाओं को लेकर दिए गए बयानों को सकारात्मक संकेत माना। थरूर के मुताबिक, अलग विचारधाराओं के बीच बातचीत और युवाओं की चिंताओं को समझना लोकतांत्रिक राजनीति के लिए जरूरी है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि आने वाले वर्षों में युवा मतदाताओं की भूमिका बढ़ने के साथ राजनीतिक दलों को अपनी कार्यशैली और जनता से संवाद करने के तरीकों पर गंभीरता से विचार करना होगा।

