NEET परीक्षा रद्द होने और दोबारा परीक्षा की घोषणा के बाद देशभर में छात्रों के बीच तनाव और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। पिछले दो दिनों में परीक्षा की तैयारी कर रहे चार छात्रों की मौत के मामले सामने आने से अभिभावकों, शिक्षकों और शिक्षा जगत से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ गई है। इन घटनाओं ने प्रतियोगी परीक्षाओं के बढ़ते दबाव और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
तमिलनाडु की 19 वर्षीय छात्रा मेडिकल कॉलेज में प्रवेश का इंतजार कर रही थी। परिजनों के अनुसार वह री-एग्जाम की घोषणा के बाद काफी चिंतित रहने लगी थी। उसने अपने करीबी रिश्तेदारों को भेजे संदेश में दोबारा परीक्षा को लेकर डर, भविष्य की अनिश्चितता और परिवार की अपेक्षाओं का जिक्र किया था। छात्रा लंबे समय से मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही थी और डॉक्टर बनने का सपना देख रही थी।
परिवार का कहना है कि परीक्षा रद्द होने के बाद वह लगातार मानसिक दबाव में थी। घटना के बाद स्थानीय स्तर पर छात्रों को काउंसलिंग और मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराने की मांग तेज हो गई है। परिजनों ने परीक्षा प्रक्रिया में हुई गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी उठाई है।
वहीं गुजरात में NEET की तैयारी कर रहे 17 वर्षीय छात्र की मौत का मामला भी सामने आया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि छात्र मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा था। हालांकि घटना के पीछे की परिस्थितियों का पता लगाने के लिए पुलिस और प्रशासन द्वारा जांच की जा रही है। अधिकारियों ने परिजनों और परिचितों से जानकारी जुटाना शुरू कर दिया है।
इससे पहले उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भी NEET अभ्यर्थियों की मौत के मामले सामने आए थे। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षा परिणाम और प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े तनाव को कम करने के लिए प्रभावी सहायता तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है।
गौरतलब है कि मेडिकल और डेंटल पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा में हर वर्ष लाखों छात्र शामिल होते हैं। हालिया विवादों और परीक्षा रद्द होने के फैसले के बाद बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को अतिरिक्त तैयारी और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में छात्र संगठनों और अभिभावकों ने पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था के साथ-साथ विद्यार्थियों के लिए बेहतर मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है।