गाँव की गलियों से ओलिंपिक तक, खेलों का नया गढ़ बना मध्यप्रदेश: भोपाल की पहचान बनी “हॉकी की नर्सरी”, निकले विवेक सागर जैसे सितारे; अब 2028 नेशनल गेम्स की तैयारी तेज़!

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जनतंत्र, मध्यप्रदेश, श्रुति घुरैया:

आज अगर आप भारत के खेल मानचित्र को देखें, तो उसमें मध्यप्रदेश की चमक साफ दिखाई देती है। आज़ादी के बाद जिस राज्य में खेल महज़ सीमित दायरे में थे, वही प्रदेश अब प्रतिभा का गढ़ और खेल संस्कृति का मज़बूत केंद्र बन चुका है।

गाँवों की गलियों से लेकर बड़े शहरों के मैदान तक—मध्यप्रदेश ने खिलाड़ियों को न सिर्फ खेलों से जोड़ा बल्कि उन्हें आत्मविश्वास, पहचान और अवसर भी दिए। यही वजह है कि इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और उज्जैन जैसे शहर अब खेल इतिहास के सुनहरे अध्याय लिख रहे हैं।

 1950 से 80 का दौर : इंदौर, भोपाल और ग्वालियर – खेल प्रतिभा की जन्मभूमि

आज से लगभग 70 साल पहले 1950 से 1980 का दौर क्रिकेट और पारंपरिक खेलों का रहा। इंदौर की होलकर टीम ने रणजी ट्रॉफी में लगातार जीत दर्ज कर राष्ट्रीय स्तर पर मध्यप्रदेश को गौरव दिलाया। वहीं ग्वालियर और उज्जैन जैसे शहरों ने पारंपरिक खेल मल्लखम्ब को नई पहचान दी। धीरे-धीरे कराटे और बैडमिंटन जैसे खेलों का भी विस्तार हुआ और प्रदेश ने पहली बार ओलंपिक स्पर्धाओं की तरफ गंभीर कदम बढ़ाए। युवाओं के लिए खेल उस समय सिर्फ शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और अनुशासन का प्रतीक बन गए।

21वीं सदी तक आते-आते स्थिति पूरी तरह बदल गई। अब खेल सिर्फ जुनून नहीं, बल्कि प्रोफेशन और पहचान बन गए।

भोपाल – “हॉकी की नर्सरी”

अगर भारतीय हॉकी की कहानी लिखी जाए तो उसमें भोपाल का नाम न आए, तो कहानी अधूरी रह जाएगी। भोपाल को लंबे समय से “हॉकी की नर्सरी” कहा जाता है।

  • ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार,

  • ओलिंपियन ज़फर इक़बाल,

  • 1975 विश्वकप विजेता असलम शेरखान,

  • और टोक्यो-2020 व पेरिस-2024 ओलिंपिक में कांस्य पदक दिलाने वाले युवा सितारे विवेक सागर प्रसाद

ये सब भोपाल की उसी विरासत की गवाही देते हैं, जिसने भारत को विश्व हॉकी में बार-बार गर्व करने का मौका दिया।

ऐशबाग स्टेडियम से लेकर नई अकादमियों तक, भोपाल की धड़कन हॉकी रही है। ग्वालियर की महिला हॉकी अकादमी और भोपाल की पुरुष हॉकी अकादमी ने दर्जनों अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी देश को दिए।

आधुनिक खेल ढांचा – अकादमियों से अंतरराष्ट्रीय मंच तक

21वीं सदी ने मध्यप्रदेश में खेलों का चेहरा ही बदल दिया। राज्य सरकार ने न सिर्फ मैदान और स्टेडियम बनाए बल्कि खिलाड़ियों के लिए अत्याधुनिक खेल अकादमियाँ भी खोलीं।

  • 2013 में मल्लखम्ब को राज्य खेल घोषित करना

  • शूटिंग अकादमी ऑफ एक्सलेंस (भोपाल) का निर्माण, जहाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर की रेंज मौजूद है

  • ग्वालियर की महिला हॉकी अकादमी और भोपाल की पुरुष हॉकी अकादमी

  • 22 हॉकी टर्फ और 18 उत्कृष्टता अकादमियाँ

इन पहलों ने प्रदेश को एक ऐसी पहचान दी, जिसकी मिसाल आज पूरे भारत में दी जाती है।

वॉटर स्पोर्ट्स – तालाबों से निकली लहरें

भोपाल का बड़ा तालाब सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि खिलाड़ियों की नई मंज़िल भी बन गया है। यहाँ वॉटर स्पोर्ट्स अकादमी ऑफ एक्सलेंस में कयाकिंग, रोइंग और सेलिंग जैसे खेलों की विश्वस्तरीय सुविधाएँ दी जा रही हैं।

छोटा तालाब भी पीछे नहीं—यहाँ का ईको-सिस्टम पैरा कयाकिंग और केनोइंग के लिए देश में सबसे बेहतरीन माना जाता है। यही से निकलीं प्राची यादव, जिन्होंने एशियन पैरा गेम्स में देश को नया गौरव दिलाया।

स्पोर्ट्स साइंस – खेलों का भविष्य

आज के दौर में खेल सिर्फ मैदान पर मेहनत का नहीं, बल्कि विज्ञान और तकनीक का भी खेल है।
मध्यप्रदेश ने स्पोर्ट्स साइंस सेंटर और हाई परफॉर्मेंस ट्रेनिंग अकादमी की शुरुआत की है। यहाँ खिलाड़ियों को

  • फिजियोथेरेपी

  • स्पोर्ट्स न्यूट्रिशन

  • साइकोलॉजिकल काउंसलिंग

  • और एंटी-ग्रैविटी रनिंग मशीन जैसी आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हैं।

इसका असर साफ दिखता है—थ्रॉबॉल, एथलेटिक्स और पैरा-खेलों में हालिया सफलता उसी आधुनिक दृष्टिकोण की देन है।

हालिया उपलब्धियाँ और भविष्य की राह

  • खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2025 में मध्यप्रदेश शीर्ष पाँच राज्यों में रहा।

  • पैरा-कैनोइंग में प्राची यादव ने देश को अंतरराष्ट्रीय सम्मान दिलाया।

  • ऐश्वर्य प्रताप सिंह तोमर ने एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता।

राज्य अब 2028 नेशनल गेम्स की मेजबानी की तैयारी में है। भोपाल में नाथू बरखेड़ा पर बहुखेल अंतरराष्ट्रीय परिसर और इंटरनेशनल स्पोर्ट्स साइंस सेंटर इसी दृष्टि का हिस्सा हैं।

राज्य सरकार ने हमेशा खिलाड़ियों को न केवल नगद पुरस्कार दिए बल्कि शासकीय सेवाओं में नौकरी भी प्रदान की। टोक्यो और पेरिस ओलिंपिक में कांस्य पदक दिलाने वाले विवेक सागर प्रसाद को एक करोड़ की राशि और डीएसपी पद देकर सम्मानित किया गया।

आज मध्यप्रदेश में 18 उत्कृष्टता अकादमियाँ, 22 हॉकी टर्फ और 15 से अधिक एथलेटिक ट्रैक सक्रिय हैं। यह यात्रा बताती है कि खेल अब केवल प्रतिस्पर्धा नहीं रहे, बल्कि यह प्रदेश की संस्कृति, परंपरा और आधुनिक विज्ञान का संगम बन चुके हैं। मध्यप्रदेश ने न सिर्फ भारत के खेल मानचित्र पर अपनी छाप छोड़ी है, बल्कि वैश्विक खेल जगत में भी अब यह प्रदेश मजबूती से उभर रहा है।

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