जनतंत्र, मध्यप्रदेश, श्रुति घुरैया:
मुंबई स्थित बागेश्वर बालाजी सनातन मठ में चल रहे तीन दिवसीय गणेश उत्सव के दौरान कथा वाचक पं. धीरेंद्र शास्त्री ने एक ऐतिहासिक अपील की है। उन्होंने देश के प्रमुख शंकराचार्यों, संत-महंतों और कथावाचकों से एकजुट होने की अपील करते हुए कहा कि अब समय आ गया है जब सभी को सनातन धर्म की रक्षा के लिए आपसी मतभेदों को भुलाकर एक मंच पर आना चाहिए। पं. धीरेंद्र शास्त्री ने विश्वास जताया कि संत समाज का एकजुट होना ही सनातन धर्म और भारत की सुरक्षा का एकमात्र उपाय है।
“गालियां भी आशीर्वाद हैं, लेकिन अब संवाद होना चाहिए”
गणेश उत्सव के दौरान बागेश्वर महाराज ने भक्तों को आशीर्वचन देते हुए कहा कि संतों को एकजुट होने की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया, “आदरणीय शंकराचार्य जी हमारे प्रिय हैं। यदि वे दो दिन हमें गालियां भी दें, तो भी वह हमारे लिए आशीर्वाद ही है।” पं. शास्त्री ने यह भी कहा कि अब समय आ गया है जब सभी को अपने अहंकार को छोड़कर, सनातन धर्म के उत्थान के लिए एकजुट होना होगा। उन्होंने यह संदेश भी दिया कि हमें अब संत समाज के आपसी मतभेदों को खत्म कर, समग्र उद्देश्य के लिए कार्य करने की जरूरत है।
संघर्ष नहीं, संवाद का समय है
पं. धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि आपसी संघर्ष से सनातन धर्म की सुरक्षा नहीं हो सकती, बल्कि इससे धर्म कमजोर होगा। उन्होंने बताया कि अब समय है जब संत और महंत अपने-अपने मतभेदों को त्यागकर एक-दूसरे के साथ संवाद करें। पं. शास्त्री ने अपनी भावुक अपील में कहा, “यदि हमें सनातन धर्म को बचाना है, तो हमें एक-दूसरे से लड़ना बंद करना होगा। अब समय है संवाद का, न कि संघर्ष का।”
संतों का एकजुट होना भारत को आंतरिक संघर्षों से बचा सकता है
बागेश्वर महाराज ने एक बार फिर अपने विचारों को साझा करते हुए कहा कि यदि संत समाज एकजुट हो जाता है, तो न केवल सनातन धर्म सुरक्षित रहेगा, बल्कि भारत भी आंतरिक संघर्षों और विभाजन से बच सकता है। उनका मानना था कि देश की समृद्धि और संतुलन को बनाए रखने के लिए संतों का एक मंच पर आना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह संदेश गणेश उत्सव के दौरान भक्तों और संतों दोनों को समर्पित किया।
गणेश उत्सव का संदर्भ और संतों के एकजुट होने का महत्व
गणेश उत्सव एक ऐसा अवसर है जब भक्तों और संतों को एकजुट होकर अपने धर्म और संस्कृति का सम्मान करने का मौका मिलता है। पं. धीरेंद्र शास्त्री का यह संदेश इस समय पर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जब देश के विभिन्न हिस्सों में धार्मिक और सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। उनका कहना है कि यदि संत समाज अपने अहंकार और व्यक्तिगत मतभेदों को पीछे छोड़कर एक साथ आए, तो न केवल धर्म की रक्षा होगी, बल्कि भारत भी कई आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से बच सकेगा।